रेटिंग: ⭐⭐⭐⭐(4/5)
फिल्म: वध 2
लेखक व निर्देशक: जसपाल सिंह संधू
निर्माता: लव रंजन, अंकुर गर्ग
कलाकार: नीना गुप्ता, संजय मिश्रा, योगिता बिहानी, कुमुद मिश्रा, अक्षय डोगरा, शिल्पा शुक्ला
Vadh 2 Movie Review: कुछ फिल्में तेज़ रफ्तार और शोर के सहारे असर छोड़ती हैं, जबकि कुछ अपनी खामोशी, ठहराव और भावनात्मक गहराई से भीतर तक उतर जाती हैं। ‘वध 2’ दूसरी किस्म की फिल्म है—जो धीरे चलती है, लेकिन बहुत दूर तक जाती है।
फिल्म की शुरुआत साल 1994 से होती है, जहां मंजू देवी (नीना गुप्ता) को डबल मर्डर के आरोप में 28 साल की सजा सुनाई जाती है। उसी जेल में तैनात गार्ड शंभुनाथ मिश्रा (संजय मिश्रा) मंजू से एक ऐसा प्रेम करता है, जो शब्दों से ज़्यादा खामोशी में ज़िंदा रहता है।
शंभु चोरी-छिपे जेल की सब्ज़ियां बाहर बेचता है और मंजू की हर छोटी-बड़ी ज़रूरत पूरी करने की कोशिश करता है—बिना किसी उम्मीद के।
कहानी उस वक्त नया मोड़ लेती है जब प्रकाश सिंह (कुमुद मिश्रा) जेल के नए अधीक्षक बनकर आते हैं। जेल का एक बिगड़ैल और हिंसक कैदी केशव (अक्षय डोगरा), युवा महिला कैदी नैना (योगिता बिहानी) पर गलत नज़र डालता है। एक रात ऐसा कुछ घटता है, जो पूरे सिस्टम को हिला देता है—प्रकाश सिंह केशव की बेरहमी से पिटाई कर देता है और इसके बाद केशव रहस्यमय तरीके से जेल से गायब हो जाता है।
केशव के गायब होने की जांच के लिए इंस्पेक्टर अतीत सिंह (अमित के. सिंह) जेल पहुंचते हैं। इसके बाद पूरी फिल्म एक ही सवाल के इर्द-गिर्द घूमती है—
केशव कहां गया? और उसके साथ आखिर हुआ क्या?
फिल्म के शुरुआती हिस्से में संजय मिश्रा और नीना गुप्ता के बीच एक बेहद खूबसूरत सीन है—तारों से भरे आसमान के नीचे, जेल की दीवार के आर-पार, बिना एक-दूसरे को देखे बातचीत। इस दृश्य में सुकून है, दर्द है और एक ऐसा प्रेम है जो बोलता नहीं, महसूस कराया जाता है। यहीं से साफ हो जाता है कि अभिनय का स्तर असाधारण होने वाला है।
‘वध 2’ कोई तेज़-तर्रार मसाला फिल्म नहीं है। यह आर्ट-टच थ्रिलर की तरह आगे बढ़ती है। शुरुआत भले ही थोड़ी स्लो लगे, लेकिन जैसे-जैसे कहानी रफ्तार पकड़ती है, सस्पेंस गहराता जाता है।
इंटरवल से पहले फिल्म मजबूत पकड़ बना लेती है। सेकंड हाफ में क्लाइमैक्स से ठीक पहले थोड़ा ठहराव महसूस होता है, लेकिन जब अंतिम सच्चाई सामने आती है, तो एहसास होता है कि दर्शक जिस नतीजे पर पहुंच चुका था—वह पूरी तरह गलत था।
नीना गुप्ता बिना बोले बहुत कुछ कह जाती हैं। उनकी आंखें और एक्सप्रेशंस कहानी को आगे बढ़ाते हैं।
संजय मिश्रा पूरी फिल्म में मासूम, सच्चे और बेहद मानवीय लगते हैं—उनका किरदार दिल में उतर जाता है।
कुमुद मिश्रा हर सीन में अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं।
इतने दमदार कलाकारों के बीच भी अमित के. सिंह अपनी सधी हुई एक्टिंग से गहरा प्रभाव छोड़ते हैं।
योगिता बिहानी अपनी मासूमियत से सहानुभूति जगाती हैं, जबकि अक्षय डोगरा अपने किरदार से नफरत पैदा करने में पूरी तरह कामयाब रहते हैं।
शिल्पा शुक्ला के सीन कम हैं, लेकिन उनका अभिनय याद रह जाता है।
निर्देशक जसपाल सिंह संधू की यह फिल्म बेहद इंटेंस है। कई दृश्य ऐसे हैं जो भीतर तक सिहरन पैदा करते हैं—खासकर वह सीन, जहां प्रकाश सिंह केशव की पिटाई करता है। उस पल दर्शक भी किरदारों का दर्द, गुस्सा और बेबसी महसूस करता है।
फिल्म लगातार यह भरोसा दिलाती रहती है कि आप सब समझ चुके हैं—और फिर आख़िरी पल में आपको पूरी तरह गलत साबित कर देती है।
‘वध 2’ ज़रूर देखें। यह एक सधी हुई, गंभीर और सोचने पर मजबूर करने वाली फिल्म है। सिनेमा प्रेमियों के लिए खास, और मसाला फिल्मों के शौकीनों को यह समझाने के लिए काफी कि बिना बेवजह के ड्रामे के भी बेहतरीन सिनेमा बनाया जा सकता है।


